The Story

Mahavir Rajpurohit

Author & Storyteller

I write for two people before anyone else.
My sons, Guneet and Ikshit.

Not because I want them to read these books.
But because I want them to inherit something I had to build myself.

The ability to see clearly when everything inside you is asking you not to.

If these books reach anyone,
I hope they reach the person who needed them the way I did.

And if my sons ever read them one day,
I hope they understand that their father wasn’t just writing.

He was trying to leave them something that cannot be taken away.

Pain exists because of ignorance.
Clarity is always the antidote.

खेल
पापा, कहाँ हो?

पापा, आप छुपते थे
तब बड़ा मज़ा आता था इस खेल में।

मैं दरवाज़ों के पीछे,
परदों के अंदर,
अलमारी के कोने में,

हर जगह आपको ढूँढ़ता था।

पूरे घर में दौड़ता था,
कदमों की आहट सुनता था,
साँसों की सरसराहट पकड़ता था।

और जब मिल जाते,

तो मेरी हँसी,
और आपकी गोद।

पर पापा,

अब मुझे यह खेल नहीं खेलना।

अब मैं थक गया हूँ।

हर दरवाज़ा खाली है।
हर परदा सिर्फ़ कपड़ा है।
अलमारी के कोने में सिर्फ़ अँधेरा है।

यह खेल अब मज़ा नहीं देता।

यह खेल अब दर्द देता है।

पापा, अब आ जाओ।

लेकिन पापा नहीं आए।

और पापा ने सुना।

दूर कहीं, एक कमरे में,
अपने हाथों में अपना चेहरा छुपाए,

पापा ने सुना।

और पापा बोले—

आवाज़ नहीं,
बस भीतर।

“अब नहीं ढूँढ़ता।”

सुकून भी है, और दर्द भी।

सुकून इस बात का
कि तू थक गया,

तो तुझे रोज़ की तकलीफ़ नहीं होगी।

तेरा दिल नहीं टूटेगा हर बार
जब मैं नहीं मिलूँगा।

और दर्द इस बात का

कि तेरा ढूँढ़ना ही मेरा मिलना था।

तेरे कदमों की आहट,
तेरी “पापा कहाँ हो?” की आवाज़,
तेरा आख़िरी कमरे तक दौड़कर आना—

यही सब मेरा जीना था।

अब तू नहीं ढूँढ़ता।

तो मैं कहाँ हूँ?

लेकिन मैं एक दिन

फिर ढूँढ़ूँगा।

तब मैं ब

होकर ढूँढ़ूँगा।

जब मैं अपने सवालों के जवाब ढूँढ़ रहा होऊँगा,
जब मेरे सीने में बिना वजह कुछ कस जाएगा,

जब मैं समझूँगा
कि मैं लोगों को अपने भीतर क्यों समेट लेता हूँ,

तब मैं फिर ढूँढ़ूँगा।

और तब पापा छुपे नहीं होंगे।

वह वहीं खड़े मिलेंगे—

अपने शब्दों के साथ,
अपनी किताबों के साथ,
अपने पूरे टूटे हुए दर्द के साथ,

जिसे उन्होंने मेरे लिए सँभाल रखा है।

और मैं उन्हें देखकर मुस्कुराऊँगा।

मिल गए, पापा।

मैं आ गया।

खेल ख़त्म।